Friday, July 9, 2021

शनि कवचम्

अस्य श्रीशनैश्चर कवच स्तोत्रमंत्रस्य कश्यप ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द: शनैश्चरो देवता । 
श्रीं शक्ति: शूं कीलकम्, शनैश्चर प्रीत्यर्थे पाठे विनियोग: ।।

नीलाम्बरो नीलवपु: किरीटी गृध्रस्थितत्रासकरो धनुष्मान्।।
चतुर्भुज: सूर्यसुत: प्रसन्न: सदा मम स्याद्वरद: प्रशान्त:।।1।।

श्रृणुध्वमृषय: सर्वे शनिपीडाहरं महत् ।।
कवचं शनिराजस्य सौरेरिदमनुत्तमम् ।।2।।

कवचं देवतावासं वज्रपंजरसंज्ञकम्।।
शनैश्चरप्रीतिकरं सर्वसौभाग्यदायकम् ।।3।।

ॐ श्रीशनैश्चर: पातु भालं मे सूर्यनंदन: ।।
नेत्रे छायात्मज: पातु कर्णो यमानुज: ।।4।।

नासां वैवस्वत: पातु मुखं मे भास्कर: सदा ।।
स्निग्धकण्ठश्च मे कण्ठ भुजौ पातु महाभुज: ।।5।।

स्कन्धौ पातु शनिश्चैव करौ पातु शुभप्रद:।।
वक्ष: पातु यमभ्राता कुक्षिं पात्वसितस्थता ।।6।।

नाभिं गृहपति: पातु मन्द: पातु कटिं तथा ।।
ऊरू ममाSन्तक: पातु यमो जानुयुगं तथा ।।7।।

पदौ मन्दगति: पातु सर्वांग पातु पिप्पल: ।।
अंगोपांगानि सर्वाणि रक्षेन् मे सूर्यनन्दन: ।।8।।

इत्येतत् कवचं दिव्यं पठेत् सूर्यसुतस्य य: ।।
न तस्य जायते पीडा प्रीतो भवन्ति सूर्यज: ।।9।।

व्ययजन्मद्वितीयस्थो मृत्युस्थानगतोSपि वा ।।
कलत्रस्थो गतोवाSपि सुप्रीतस्तु सदा शनि: ।।10।।

अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्मद्वितीयगे ।।
कवचं पठते नित्यं न पीडा जायते क्वचित् ।।11।।

इत्येतत् कवचं दिव्यं सौरेर्यन्निर्मितं पुरा ।।
जन्मलग्नस्थितान्दोषान् सर्वान्नाशयते प्रभु: ।।12।।

गणपति अथर्वशीर्षम्

ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि।।
त्वमेव केवलं कर्त्ताऽसि।
त्वमेव केवलं धर्तासि।।
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।।1।।

त्वं साक्षादत्मासि नित्यम्।
ऋतं वच्मि।। सत्यं वच्मि।।
अव त्वं मां।। अव वक्तारं।।
अव श्रोतारं। अवदातारं।।
अव धातारम अवानूचानमवशिष्यं।।2।।

अव पश्चातात्।। अवं पुरस्तात्।।
अवोत्तरातात्।। अव दक्षिणात्तात्।।
अव चोर्ध्वात्तात।। अवाधरात्तात।।
सर्वतो मां पाहिपाहि समंतात् ।।3।।

त्वं वाङग्मयचस्त्वं चिन्मय।
त्वं वाङग्मयचस्त्वं ब्रह्ममय:।।
त्वं सच्चिदानंदा द्वितियोऽसि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि।।4।।

सर्व जगदि‍दं त्वत्तो जायते।
सर्व जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्व जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।।
सर्व जगदिदं त्वयि प्रत्येति।।
त्वं भूमिरापोनलोऽनिलो नभ:।।
त्वं चत्वारिवाक्पदानी ।।5।।

त्वं गुणयत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत: त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मूलाधार स्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्ति त्रयात्मक:।।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यम्।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं।
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुव: स्वरोम् ।।6।।

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।।
अनुस्वार: परतर:।। अर्धेन्दुलसितं।।
तारेण ऋद्धं।। एतत्तव मनुस्वरूपं।।
गकार: पूर्व रूपं अकारो मध्यरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्य रूपं।। बिन्दुरूत्तर रूपं।।
नाद: संधानं।। संहिता संधि: सैषा गणेश विद्या।।
गणक ऋषि: निचृद् गायत्रीछंद:।। ग‍णपति देवता।।
ॐ गं गणपतये नम: ।।7।।

एकदंताय विद्महे। वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नोदंती प्रचोद्यात।।
एकदंत चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।।
अभयं वरदं  हस्तै र्विभ्राणं मूषक ध्वजम्।।
रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।।
रक्त गंधाऽनुलिप्तागं रक्तपुष्पै सुपूजितम् ।।8।।

 भक्तानुकंपिन देवं जगत्कारणम्च्युतम्।।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृतै: पुरुषात्परम।।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनांवर:।। 9।।

नमो व्रातपतये नमो गणपतये।। नम: प्रथमपत्तये।।
नमस्तेऽस्तु लंबोदारायैकदंताय विघ्ननाशिने शिव सुताय।
श्री वरदमूर्तये नमोनम:।।10।।

आदित्य हृदय स्त्रोत्रम्

 ततो युद्धपरिश्रन्तं समरे चिन्तया स्थितम्।

रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥ 01

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवान् ऋषिः॥ 02

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥ 03

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
जयावहं जपेन्नित्यम् अक्षय्यं परमं शिवम्॥ 04

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
चिन्ताशोकप्रशमनम् आयुर्वर्धनमुत्तमम्॥ 05

रश्मिमंतं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥ 6

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः॥ 07

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥ 08


पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः।
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥ 09

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः॥ 10

हरिदश्वः सहस्रार्चि: सप्तसप्ति-मरीचिमान।
तिमिरोन्मन्थन: शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान॥ 11

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः।
अग्निगर्भोsदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशान:॥ 12

व्योम नाथस्तमोभेदी ऋग्य जुस्सामपारगः।
धनवृष्टिरपाम मित्रो विंध्यवीथिप्लवंगम:॥ 13

आतपी मंडली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः।
कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भव:॥ 14

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोस्तुते॥ 15

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रए नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥ 16
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाए नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥ 17

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः।
नमः पद्मप्रबोधाय मार्तण्डाय नमो नमः॥ 18

ब्रह्मेशानाच्युतेषाय सूर्यायादित्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥ 19

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषाम् पतये नमः॥ 20

तप्तचामिकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोsभिनिघ्नाये रुचये लोकसाक्षिणे॥ 21

नाशयत्येष वै भूतम तदेव सृजति प्रभुः।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥ 22

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
एष एवाग्निहोत्रम् च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम॥ 23

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनाम फलमेव च।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥ 24

एन मापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
कीर्तयन पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव॥ 25

पूज्यस्वैन-मेकाग्रे देवदेवम जगत्पतिम।
एतत त्रिगुणितम् जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥ 26

अस्मिन क्षणे महाबाहो रावणम् तवं वधिष्यसि।
एवमुक्त्वा तदाsगस्त्यो जगाम च यथागतम्॥ 27

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोsभवत्तदा।
धारयामास सुप्रितो राघवः प्रयतात्मवान ॥ 28

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परम हर्षमवाप्तवान्।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान॥ 29

रावणम प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत।
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोsभवत्॥ 30

अथ रवि-रवद-न्निरिक्ष्य रामम। मुदितमनाः परमम् प्रहृष्यमाण:।
निशिचरपति-संक्षयम् विदित्वा सुरगण-मध्यगतो वचस्त्वरेति॥ 31

Friday, February 2, 2018

संयुक्त परिवार

संयुक्त परिवार अर्थात वह परिवार जिसमें दादा दादी माता पिता  चाचा चाची  भाई-बहन आदि सभी मिल जुलकर साथ साथ रहते हैं । आज के संवेदनशील संसार मे संयुक्त परिवार बहुत कम मिलता है । जबकि  यह आधुनिक समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है ।संयुक्त परिवार मे बच्चे एक दूसरे के साथ मिल जुलकर  साथ साथ रहना  एक दूसरे के सुख-दुख को समझना, एक दूसरे के साथ ज्ञानार्जन करना सीखते हैं ।जहाँ परिवार के लोग ही साथ साथ नही रह सकते, वहाँ वसुधैव कुटुम्बकम के बारे मे सोचना कोरी कल्पना होगी । अतः संयुक्त परिवार वसुधैव कुटुम्बकम की पहली पाठशाला है । संयुक्त परिवार मे बच्चे संस्कारों के   साथ साथ  अपने बड़े  बुजुर्गो की सेवा कर आशीर्वाद  प्राप्त करना आदि गुण भी सीखते हैं। इस प्रकार वे अपने परिवार  मे रिश्ते की अहमियत को भी समझते हैं ।

Sunday, September 17, 2017

संस्मरण

प्रातःकाल की पूजा के  समय दीप -वर्तिका दक्षिण  की ओर हो गई । मेरा मन अशांत  सा हो उठा । अनायास  मेरे मन मे मेरे  पिता श्री  के प्रति  अनिष्ट की  कल्पना  जाग उठी । आज  एकादशी  की पूजा के अन्त मे अनन्त की आरती के  समय  मोबाइल फोन  की घंटी  का बजना  मेरे  मन और  भी  भयभीत  कर दिया । मुझे  फोन  तक पहुँचने के  पहले ही मेरे बड़े  पुत्र  ने  मेरे  पिता  श्री के चिर निद्रा  मे विलीन  होने  की दुखद  घटना  का समाचार  दिया । मेरे  व्यग्र  मन  ने  मुझे  ढाढ़स  बॅधाया ।  उनके अंतिम  समय  मे पास  मे न होने की ग्लानि  मुझे  जीवन  भर रहेगी । उसी दिन  सायंकाल  काशी की पवित्र  नगरी  मे गंगा जी के पावन तट पर मेरे अग्रज ने  मुखाग्नि दी । इस प्रकार उनका पार्थिव शरीर  पंचतत्व  मे विलीन हो गया  ।
    
     हरि ओम तत् सत् ।

Tuesday, August 15, 2017

अपने क्षेत्र में बार-बार विजली की भयंकर समस्या उत्पन्न होने की शिकायत करते हुए विद्युत बोर्ड के अधिकारी को पत्र ।

सेवा में
विद्युत बोर्ड  अधिकारी
के ख ग नगर

विषय - विजली आपूर्ति  की समस्या निवारण हेतु

महोदय,
निवेदन है कि मैं क ख ग  नगर  का  निवासी हूँ  । हमारे  नगर में  आये दिन विद्युत आपूर्ति  बाधित  होती रहती है । कोई भी  दिन  ऐसा नहीं  होता  कि विजली  चार  से पाँच  बार  न जाती हो । कभी कभी  तो  कई  घंटे  इंतजार करना  पडता है । भीषण गर्मी  से  बच्चों  एवं  बूढों का बुरा हाल है । विद्युत  बोर्ड  में  फोन  करने पर  कोई  सही जबाब नहीं  मिलता  ।
         अतः  महोदय  से निवेदन है कि हमारे क्षेत्र में विद्युत आपूर्ति की  समस्या के कारण  का पता कर उचित कार्यवाही  करने का  कष्ट करें । हमारी  समस्याओं को  ध्यान में रखते हुए  उन्हें  दूर करने का प्रयास  करें,  जिससे  हमारे  क्षेत्र में निर्बाध रूप से  विद्युत आपूर्ति उपलब्ध  हो सके  ।
सधन्यवाद
भवदीय
अ ब स
दिनांक  - 14 अगस्त ,2017

अधिकार और कर्तव्य

अधिकार और कर्तव्य दोनों  एक ही  सिक्के के दो पहलू हैं । अधिकार  लोगों के  जीवन की  सुरक्षा  निश्चित  करता है । किसी भी  देश की  सरकार  या वहाँ के लोगों को  अपने देश के  नागरिकों के  अधिकारों की रक्षा  करने के लिए सदैव तत्पर  रहना चाहिए । विश्व में  मानवाधिकार आयोग  एक  संस्था है जो लोगों के  अधिकारों की  सुरक्षा  सुनिश्चित  करती है । जिसके द्वारा विश्व  में  कहीं भी लोगों के साथ  हो रहे अन्याय व अत्याचार के खिलाफ  आवाज उठाई जाती है ।हम अपने  अधिकारों  को पाने के हकदार हैं  ,परन्तु  अपने  कर्तव्यों का पालन करना  भी  हमें  अपना  धर्म  समझना  चाहिए । हमें  सदैव  यह ध्यान रखना चाहिए कि हम अपने अधिकार के लिए किसी  दूसरे के अधिकार में  बाधा  न डालें । अगर  ऐसा होता है  तो  ही सब के अधिकारों की रक्षा  हो सकेगी । सभी लोग अपने  अधिकार प्राप्त  करना चाहते हैं  और  कर्तव्य  का पालन करने  से दूर  भागेंगे  तो यह  सर्वदा  असंभव होगा ।अतः  अधिकार के साथ कर्तव्य  पालन  अत्यंत आवश्यक  व महत्वपूर्ण है  ।