Wednesday, January 14, 2015

निर्झरिणी

निर्झरिणी बह रही निरंतर
     कंकड पत्थर पर चल-चल कर ।।

नहीं कभी पीछे मुडती है
       सदा अग्रसर ही रहती है
                बादल से जल ले लेकर
                          सागर तक ढोती रहती है
                                      बिना थके काट रही है
                                               पर्वत से सागर का अंतर ।

निर्झरिणी बह रही निरंतर
             कंकड पत्थर पर चल- चल कर ।।

तट की हरियाली ललचाती
          लेकिन उसे रोक न पाती
                    दृढ निश्चय से आगे बढती
                          कल- कल छल- छल का रव करती
                                                  कुसुमित कूल सुमन सुंदर

निर्झरिणी बह रही निरंतर
             कंकड पत्थर पर चल- चल कर ।।

                                                                      राजेंद्र प्रसाद मिश्र

Gazal गजल

जख्म कितना भी हो, दर्द  होता ही नहीं ।
मंजिले  - ए दूर हो या दुर्गम-ए-राह हो ,
साथ संगीन हो, या हाथ मे हाथ हो
पथ पर फूल हो, पर रात सोता ही नही
जख्म कितना भी दो, दर्द तो होता ही नहीं ।।

दैव दुर्दिन दिखाए, या खेलाए खून की होली
साथ मे कफन हो या हाथ रंगीन चोली
रात बीते न बीते सबेरा होता ही नही
जख्म कितना भी हो,  दर्द होता ही नहीं ।।

लडखडाते पाॅव तले खडे हो तीर तीखे
मौत का खौफ नहीं प्राण चीखे न चीखे
आप मानो न मानो, दिल रोता ही नहीं
जख्म कितना भी ही पर दर्द होता ही नहीं ।।
                 
                                                     राजेंद्र मिश्रा

Thursday, January 1, 2015

स्वच्छता की राह पर एक कदम रख करके देखो ।

स्वच्छता की राह पर ,
दो कदम चल करके देखो ।
देश का सम्मान होगा ,
स्वास्थ्य का वरदान होगा,
आत्मबल पर बलदेकर
यह कदम भर करके देखो ।
स्वच्छता की राह पर ,
एक कदम रख करके देखो ।।

देश को अभिमान होगा ,
विदेश में सम्मान होगा,
जिन्दगी के लक्ष्य मे ,
एक कदम भर करके देखो ।
स्वच्छता की डगर पर ,
यह कदम धर करके देखो ।।

                       राजेंद्र प्रसाद मिश्र

Monday, December 1, 2014

Pyar bina koi geet nahi hai.-प्यार बिना कोई गीत नहीं है।

प्यार बिना कोई गीत नहीं है ।
प्यार बिना संगीत नहीं है ।।

जग के सभी चराचर में
आकर्षण का प्यार भरा है
ग्रह - नक्षत्र-उपग्रह- तारे,
सब मे है आकर्षण प्यारे ।

सूरज प्यार धरा से करता,
प्रतिदिन अपनी नवकिरणो से
जगती का आलिंगन करके
जग को प्यार निछावर करता
धरती का वह मीत सही है ।
प्यार बिना कोई गीत नहीं है ।।

नील गगन में पंख खोलकर
गोते खाते हैं पक्षी गण,
प्रणय-गीत को गा-गाकरके
सह देते संसार सृजन में, 
नहीं प्रीति की रीति नई है।
प्यार बिना संगीत नहीं है ।।

रंग- विरंगे पंख खोलकर,
तितली मंडराती फूलों पर
करती मधुरस पान सुहृद का,
पुष्प- पुष्प पर घूम -घूम कर ,
है बिखेरती नव पराग-कण।
फूलों का परांगण करके ,
सह देतती संसार सृजन में ।
तितली का फूलों से बढकर, 
जग में कोई मीत नहीं है
प्यार बिना कोई गीत नहीं है।
प्यार बिना संगीत नहीं है ।।

                                  राजेन्द्र मिश्रा

Thursday, November 27, 2014

Tum kavita ham (mai) sangit priye -तुम कविता हम संगीत प्रिये ।

तुम कविता हम संगीत प्रिये ।
तुम वसंत हम गीत प्रिये  ।।

हम वंशी तुम समीर प्रिये,
तुम प्राण हम शरीर प्रिये ।
तुम राग - द्वेष से परे, हम
माया के बंधन में जकडे ।

तुम वसंत हम शीत प्रिये,
तुम कविता हम संगीत प्रिये ।।

तुम सुंदर सुमन सुगंधित,
हम पतझड से युक्त प्रिये,
तुम कविता की अविरल धारा
हम लय -ताल -वद्ध संगीत प्रिये,

तुम कविता हम संगीत प्रिये ।
तुम वसंत हम गीत प्रिये ।।

                                      राजेंद्र मिश्रा

Thursday, November 13, 2014

लाक्षागृह का निर्माण Lakshagrih ka nirman

दुर्योधन शकुनि की चाल बडी
दोनों ने मिलकर युक्ति गढी   ।
जो गुड देने से मर जाए
उसको क्यों जहर दिया जाए।।

विरोचन को आज्ञा दें दी
लाक्षागृह का निर्माण करो ।
पांडव का काल निकट आया
अंत्येष्टि का इंतजाम करो  ।।

पांडव को बहला कर के
लाक्षागृह रहने भेज दिया ।
कपटी दुर्योधन इस प्रकार
नया खेल था खेल दिया ।।

षड्यंत्र सफल होता कैसे
विदुर- निति के आगे
पांडव लाक्षागृह जला दिये
स्वयं सुरंग से भागे   ।।

                                                  राजेंद्र प्रसाद  मिश्र

दुर्योधन का अपमान Duryodhan ka apmaan

कर अथक परिश्रम पांडव ने
निज नव गृह -निर्माण किया।
न्योता भेजा था दूर- दूर
दुर्योधन का भी आह्वान किया ।।

कुटिल मंडली साथ लिए
दुर्योधन आया इन्द्र प्रस्थ।
भवन द्वार से कर प्रवेश
पीछे छोडे हाथी- घोडे रथ ।।

जल में थल, थल पर जल का
दुर्योधन को अनुमान हुआ
ईर्ष्या से जलते कुरू ज्येष्ठ का
जल मे गिरकर अपमान हुआ।।

पांचाली बोली अंधे के घर
अंधे ही जन्म  लिया करते
काॅटे से युक्त बबूलो पर
कब आम- अनार उगा करते ?

दुर्योधन भी आग बबूला हो
उत्सव से बाहर चला गया ।
'अपमान का बदला लूँ गा 'कह
इंद्र प्रस्थ से चला गया ।।

दुर्योधन बाहर चला गया
आखों में ज्वाला भरे हुए ।
पांचाली की कटु- मृदुल हॅसी का
चित्रण नयनों में लिए हुए ।।

                                                            राजेंद्र प्रसाद मिश्र